रजामंदी।

और तुम्हें पता है क्या अक्सर मुझेे यह लगता है कि मेरा दिमाग मुझे तुम्हारे जाने के बाद भी तुम्हारे ही ख़याली पुलाव पकाते रहता हैं। और यह हमेशा फीके ही रह जाते है। पता ह क्यूं? क्योंकि तुम्हारे साथ होने का जायका इसमें अब रहा जो नहीं।

तुमने हो सकता हैं सारे बंधनो को एक पल में ही तोड़ दिया हो, मगर यकीन मानों हमारे रिश्ते की टूटी हुयी डोरी को मैं आज भी सडक के उस चौराहे पर लिए खडा हूं जहां तुमने किसी और इंसान के पल भर की मोहब्बत की वजह से बड़ी बेरहमी से मेरा दिल तोड़ दिया था।

जैसे कोई टूटे हुए दिल के साथ, नम आंखे, साथ फड़फड़ाते होंठ, और जल्लाता हुआ मेरा जिस्म तुम्हारा ही नाम चिल्ला रहा हो। आज भी बस इसी ख्यालात में कई रातें काट दिया करता हूं कि मेरे साथ सारे संबंध तोड़ तुम्हारे दिल ने उसकी बाहों में जाने की रजामंदी कैसे दी होगी?

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15 thoughts on “रजामंदी।”

  1. मर्म-स्पर्शी रचना! 🙁 कितना दर्द है आपके शब्दों में। बहुत ही खूबसूरत तरीके से अपने जज़बातों को बयां किया है आपने, सर। क्या पता उसकी भी कोई मजबूरी रही हो! 😐 ऐसे ही दर्द को कविता के माध्यम से व्यक्त करते रहिए।

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    1. मजबूरी नहीं बच्चे को होेन वाली तलब उस खिलौने के लिए, की उसे पा लेना ही सब कुछ हैं।
      मगर पता हैं क्या? वो खिलौने से उब कर बहुत जल्द ही अगले खिलौने पर जाएगा । और ऐसे बदतमीज बिगड़ैल बच्चो से कोसों दूरी रखना चाहिए। इन लोगों की तासीर बड़ी बुरी होती हैं।

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      1. डांटा उनको जाता हैं जो अपने हो।
        और रही बात समझाने की, गलती को माफी दी जा सकती हैं, बेवकूफी को नहीं।

        कोयले के चक्कर में लोगों ने हीरा खोया हैं, ज़िन्दगी तरसा देगी, मगर हीरा बस अब दूर से ही देखा जाएगा। और वो भी एक और चमकते सितारे के साथ।

        कोयले की शक्ल ज़िन्दगी में ही बस जाए, और ज़िन्दगी काली कर जाए यह दुआ हैं 😂

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